क्या लिखूं, कैसे लिखूं, सवाल मन में अनेक हैं,
भटके हुए से रास्ते, पर भाव दिल में नेक हैं।
पहले अक्षर आएँगे या शब्द आकर सजेंगे,
या वाक्यों के ताने-बाने सुर बनकर बजेंगे?
किसी ने हौसला दिया कि 'तू लिख तो सही',
पर उलझन वही थी कि शुरुआत हो कहाँ से नई।
सोचते-सोचते यूँ ही वक़्त गुज़रता गया,
और ख्यालों का एक नया रंग निखरता गया।
फिर अचानक अक्षरों का एक मेला सा लग गया,
जो सोया था हुनर भीतर, वो जाग सा गया।
हज़ार अक्षर मिले, फिर लफ़्ज़ों का कारवां बना,
लिखते-लिखते न जाने कब एक हसीं अफ़साना बना।
अब लिखो तुम बेफ़िक्री से, कोई बंदिश नहीं यहाँ,
जहाँ सही सोच हो, वहाँ भटकता नहीं कारवां।
वहाँ सोचने की भला क्या ज़रूरत आन पड़ती है,
जहाँ कलम दिल की धड़कनों से आगे बढ़ती है।
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