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निशान

                
                                                         
                            दुनिया में यदि निशान न होते
                                                                 
                            
मानव के अरमान भी न होते
न जीतने की कोई जिद होती
हारने पर भी तकलीफ़ न होती
ऑंसमा पर उड़ने के ख़्वाब का
तो नामो निशान भी न होता
सागर में मंथन के बाद कोई
नया मानवीय अभियान न होता
न मिसाइल मैन होता न नभ मे
भारत का परमाणु परचम फहराता
मेट्रोमेन कैसे विश्व में जाना जाता
क़दमों के निशान नई दिशा तो
रास्ते के निशान मंज़िल का पता
दे अनवरत सफलता की राह पर
गतिमान रहने का संदेश दे कर
अपना कर्तव्य निभाते हैं वहीं
हम आपस में ग़लत संकेत दे
स्वार्थी बनदुनिया को भरमाते हैं
कूयें की रस्सी के पत्थर पर निशान
करत - करत अभ्यास के जड़मत
होत सुजान बिहारी की कविता याद
दिलाकर कर मन को सकून दिलाते हैं

- निहाल चन्द्र शिवहरे

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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