तुम होते तो क्या बात होती,
तुम नहीं हो तो बातें बदल रही हैं।
चिराग़ जल रहे हैं, हवाएँ निकल रही हैं,
बदल रहे हैं बाहर के मौसम भी,
पतझड़ों के साये में जवानी निकल रही है।
तुम होते तो क्या बात होती,
तुम नहीं हो तो बातें बदल रही हैं।
तन्हाइयों का मंज़र अब देखा नहीं जाता,
राहें सिसक-सिसक के रास्ता बदल रही हैं।
चल रहा है रफ़्ता-रफ़्ता ज़िंदगी का सफ़र,
आँसुओं के साये में रातें गुज़र रही हैं।
तुम होते तो क्या बात होती,
तुम नहीं हो तो बातें बदल रही हैं।
ख़्वाहिशों का गला घोटे सफ़र यूँ निकल रहा है,
जैसे किसी के ख़्वाब से नींदें फिसल रही हैं।
बैठा हूँ लिए मैं तुझे वैसे ही अभी तक,
जैसे अमावस की रात रौशनी निकल रही है।
तुम होते तो क्या बात होती,
तुम नहीं हो तो बातें बदल रही हैं।
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