इक ख़ामोशी मुझमें कब से खल रही है
देखो मेरे कमरे में भी तनहाई पल रही है
यकीनन उस पार भी बेचैनियां बढ़ी होंगी
तभी तो राहे दिल की हसरत मचल रही है
ऐ-जिन्दगी तू ज़रा आकर इससे सबक ले
कहानी की तरह ख़ुद में मुसलसल रही है
ये इल्तिजा है कभी साड़ी में नज़र आओ
जिसकी तुरपायी बनारस में चल रही है
उसने कहा था"सिर्फ़ एक लट निकाल लेंगे"
तब से गालों पे इक लट की उलझन रही हैं
अपने लबों से मेरे गीतों को उन्माद देकर
वो हँसती आँखों में कितनी सजल रही है
उसकी जिंदगी,जद्दोजहद सब किनारे रखो
वैसे अपने नाम से वो काफी "सरल" रही हैं
-शिवम शुक्ला
पता-प्रयागराज
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
कमेंट
कमेंट X