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गिरना-उठना खेल नियति का

                
                                                         
                            जीवन धुंधली-सी इक रस्सी,
                                                                 
                            
जो जन्म-मरण के बीच तनी।

नट-सा हर कोई यहाँ विकल,
कर्म-लाठियाँ हाथ थमी।

डोले कभी इधर, कभी उधर,
जब डगमग साँसों की डोर तनी।

एक तरफ़ यदि जीत खड़ी,
तो ठीक सामने मौत खड़ी।

संतुलन ही तो जीवन का सच,
हर पल परीक्षा की है घड़ी।

गिरना-उठना खेल नियति का,
जब तक साँसें, यह डोर बनी।
-शैलेंद्र शुक्ला ‘हलदौना’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
11 घंटे पहले

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