क्या मिलेगा खड़े होकर पक्ष या विपक्ष में,
बनेगी पहचान जब होंगे खड़े समकक्ष में।
आत्मनिर्भरता करो हासिल ज़रूरी शर्त है,
कामयाबी की डगर आसान चलना दक्ष में।
व्यक्तिगत आलोचनाओं से व्यथित होते नहीं,
हौसला,हिम्मत,निडरता रखो अपने वक्ष में।
महाभारत घटित होता देख अपने ही समक्ष,
मौन युधिष्ठिर खड़ा कुछ बात तो है यक्ष में।
सृष्टि का कण-कण सतत गतिशील रहकर,
मौन हो चक्कर लगाते अपने-अपने कक्ष में।
विचारों की गंदगी भरता घुटन माहौल में भी,
चाहता हर कोई जीना साफ-सुथरा स्वच्छ में।
स्वार्थ में अंधे सिखाने चले अब 'गुंजन' उसूल,
क्या प्रमाणित करूं जो भी हो रहा प्रत्यक्ष में।
--शशि भूषण मिश्र 'गुंजन'
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