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बस अब इन २ मुर्दा आँखों से होता सब मैं देख रहा हूँ

                
                                                         
                            आँखे उदास है और लफ़्ज़ पूरी तरह से ख़ामोश है
                                                                 
                            
ना जाने क्यों सब काम ख़त्म करने की जल्दी है ।।
सब कुछ छोड़ कर आगे निकलने का मन करता है
जैसे नदी पर्वत छोड़ आगे सागर से जा मिलती है ।।

ना शौक ना ख्वाहिश ना महंगी फ़ेहरिस्त ना ही नुमाइश
और अब कुछ भी ठीक होने की ना कोई उम्मीद ना गुंजाइश ।।
ख़ुद को बहाव के साथ बहने देने को आत्मा ये निकलती है
अब क्या किसपे उँगली उठाए और क्या ही किसकी गलती है ।।

बस अब इन २ मुर्दा आँखों से होता सब मैं देख रहा हूँ
अपनी ही मैं चित्ता जलाए ख़ुद के हाथ मैं सेंक रहा हूँ
आँखो में आँसू लिए फिर से एक मनहूस शाम ये ढलती है
गंगा पार ये देह मेरी जीते हुए भी पंचतत्व में जलती है ।।

चंद आँखो में आँसू है कि मैं चलते चलते कैसे बिखर गया
चंद चेहरो पे उदासी की मैं अब अपनों से ही बिछड़ गया
सूरज कि किरणे जब तेज हो तो बर्फ की चट्टान भी पिघलती है
ना जाने क्यों सब काम ख़त्म करने की जल्दी है ।।
- शशांक श्रीवास्तव
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4 घंटे पहले

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