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दिन ढलते ही अब,एक घुटन सी लग रही है

                
                                                         
                            दिन ढलते ही अब,एक घुटन सी लग रही है
                                                                 
                            
मेरी ये आँखे कई दिनों से,निरंतर जग रही है ।।
होंठ ख़ामोश है,सारे गीत अभी बिसरे हुए है
ये ज़िंदगी बेक़दरी से,हर मोड़ पर ठग रही है ।।

मन का चप्पा चप्पा,अंधेरी रातों में अकेला है
जिंदगी तुने मेरे साथ ये खेल,बख़ूबी से खेला है ।।
दिमाग़ शांत है,हम चूर चूर यहाँ बिखरे हुए है
दुख है,दर्द है,क़र्ज़,मर्ज़ है,फ़र्ज़ है,यार यहाँ तो मेला है ।।

घड़ी की किट किट भी,अब कानों को तेज लगती है
संभल कर चलना,ये दुनिया हर कदम पर ठगती है ।।
मेरी माँ ने कल रात बताया मुझे,मैं क्या हूँ उनके लिए
एक वही तो है जो मैं ना सोता हूँ,तो वो रात भर जगती है ।।

दिल,धड़कन,दिमाग़ सब सन्नाटे में है,सब शांत है
ना कोई शोर-शराबा ना ही कोई तमाशा,यहाँ बिल्कुल एकांत है।
और जीवन के तमाम सवालों का जब तुम जवाब माँगोगे मुझसे
तो बस मेरी मुर्दा आँखे देखना और समझना सबसे हसीन “देहांत” है ।।
- शशांक श्रीवास्तव
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
40 मिनट पहले

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