छात्र है—चिंता में जलता हुआ चिनगारी,
कंधों पर सपनों की गठरी, आँखों में लाचारी।
डिग्री लिए खड़ा है, पर बाज़ार में बोली है—
“सपना नहीं, स्किल दो, वरना यहाँ झोली है!”
पढ़ा लिखा हूँ, पर मूल्य क्या है इस ज्ञान का?
काग़ज़ की नाव है, और समंदर जालदान का।
इंटरव्यू की भीड़ में गुम है पहचान,
पेट की भूख पूछती है — “कहाँ है भगवान?”
शहर-शहर घूम रहा, नौकरी की आस में,
गाँव गया तो पिता बोले — “बेटा हार मत मान तू पास में।”
पर ‘पास’ होने से काम कहाँ चलता है?
जहाँ रिश्वत का सूरज, योग्यता को जलता है।
कोचिंग, फीस, होस्टल के कर्ज़ों का भार,
काग़ज़ के टुकड़ों से क्या मिलेगा उधार?
उद्योग नहीं, शोध नहीं, बस विज्ञापन की धारा,
गुरुकुलों में नहीं, अब चलती है पीआर की मारा-मारी।
यह कैसी शिक्षा जो रोज़गार नहीं देती?
यह कैसा विकास जो श्रम की इज्ज़त नहीं लेती?
न्यू इंडिया की संतान पूछती है—
“डिग्री से भूखा पेट नहीं भरता, ये तुम कब समझोगे सत्ता की माया में पलता?”
चलो, अब नहीं झुकेंगे, नहीं सहेंगे अपमान,
श्रम की प्रतिष्ठा, ज्ञान की अस्मिता का देंगे नया स्थान।
नव निर्माण तब होगा, जब नीति बदलेगी,
तब डिग्री नहीं, कर्मठता ही राष्ट्र रच लेगी।
तो उठो! युवा हो तुम, विवेक की मशाल हो,
तुम गांधी की चिट्ठी, तुम कलाम का सवाल हो।
शिक्षा को फिर संस्कार बनाना होगा,
डिग्री नहीं, कर्मभूमि को स्वर्णिम बनाना होगा!
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