युवा-रक्त में रवि-रश्मि, उर में अरुण प्रभात जगे,
मातृभूमि के मस्तक पर, नवयुग के शत दीप जगे।
भुजबल में पर्वत-संकल्प, नयनों में आकाश रहे,
पद-पद पर पुरुषार्थ खिले, अधरों पर विश्वास रहे।
ज्ञान बने अंतर की ज्योति, कर्म बने आराधना,
सत्य बने जीवन का दीपक, सेवा बने साधना।
माटी का कण-कण बोले, तुममें मेरा मान रहे,
गंगा-सी निर्मल चेतना, हिमगिरि-सा स्वाभिमान रहे।
हल की रेखा श्रम-गाथा हो, शाला में विज्ञान जगे,
खेत, करघे, प्रयोगशाला—सबमें नव निर्माण जगे।
जाति-पंथ के क्षुद्र बंधन, टूटें समरसता के संग,
एक धरा, एक ध्येय लिए, गूँजे भारत का जय-रंग।
वेद-वाणी की पुण्य विरासत, विज्ञानों का तेज मिले,
संस्कृति की गहरी जड़ से, नव चिंतन के पुष्प खिले।
युवा नहीं केवल आयु-गणना, चेतन ज्वाला, जाग्रत मन,
युवा वही जो राष्ट्रहितार्थ, अर्पित कर दे तन-जीवन।
अंध तमस के दुर्ग गिराकर, ज्ञान-सूर्य का रथ ले आए,
सूखी धरती के अधरों पर, श्रम की सरिता फिर छलकाए।
नीति बने निर्भीक हिमगिरि, करुणा सुधा-सी धार बने,
शक्ति रहे संयमित वज्र-सी, हृदय प्रेम-आधार बने।
जब तक उर में देश धड़के, तब तक पथ अवरुद्ध नहीं,
युवा-ज्योति जब जाग उठे तो, कोई स्वप्न असिद्ध नहीं।
उठो, समय का शंख बजा है, जाग उठे भारत का स्वाभिमान,
अपने युग की धूलि सँवारो, रच दो नव इतिहास महान।
तुममें कल का सूर्य छिपा है, तुममें युग का दिव्य विधान,
तुमसे नवभारत का प्रभात, तुमसे दीप्तिमान हिंदुस्तान।
- सनातन मुकुंद
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