करुणा-किरण बरसे अंतर, जागे चिर-चैतन्य-गान।
मौन-मुकुर में झिलमिल उतरे, प्रभु-कृपा का वरदान॥
अहं-तमस जब स्वयं पिघलकर, बने समर्पण-ध्यान।
शून्य-शिखर पर खिल उठता है, अमृत-ज्योति-विधान॥
अंतर-वीणा स्वयं बजाती, अनहद का मधुगान।
बिंदु-बिंदु में सिंधु प्रकटे, मिटे सकल अज्ञान॥
जिसने निज को अर्पित कर दी, प्रभु-पद पर पहचान।
उसके जीवन का प्रत्येक क्षण, बन जाता वरदान॥
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X