माटी की सौंधी गंध लिए, बचपन फिर मुस्काता है,
सूना पड़ा पुरखा-आँगन, मन में दीप जलाता है।
तुलसी-दल पर ओस ठहरी, जैसे माँ का आँचल हो,
दीपशिखा की काँपती लौ में, ममता का संबल हो।
पिता-करों की छाँव तले जो, पहला पग धर पाया था,
उन संस्कारों ने जीवन को, अपना पथ दिखलाया था।
कच्ची दीवारों पर अब भी, हँसी हमारी अंकित है,
सूनी चौखट के कण-कण में, माँ की ममता जीवित है।
पीपल की शीतल छाया में, कितनी संध्याएँ ढलीं,
समय-धूल के नीचे दबकर, स्मृतियाँ फिर भी न मिटीं।
चूल्हे की बुझती राखों में, अब भी स्नेह सुलगता है,
रोटी की उस गंध में जैसे, पूरा घर महकता है।
कालचक्र सब छीन गया पर, एक सत्य समझ आया है—
ईंटों से घर नहीं बनता, प्रेम-सुधा जहाँ बरसाया है।
आँगन बाहर छूट गया, फिर भी अंतस में खिलता है,
बीता कल ही संस्कार बन, प्रेमामृत-सा झरता है।
- सनातन मुकुंद
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