श्वासों की वीणा पर किसका, अनहद स्वर झंकृत है,
माटी का यह दीप बता, किस ज्योति से आलोकित है?
नदियाँ नीर लुटाकर अपना, सागर में मिल जाती हैं,
वृक्ष स्वयं फल देकर जग को, दान-धर्म सिखलाती हैं।
मातृ-अंचल की छाया पाकर, जीवन पंख पसारता,
पितृ-करों का बल पाकर ही, जीवन-पथ सँवारता।
गुरु-दृष्टि से तम गलता, अंतस-सूर्य उग आता है,
ऋण चुकता नहीं दान से—जीवन जब अर्पित होता है।
- सनातन मुकुंद
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