पितृ-रक्त में बहता वंश, युग-युग की पहचान,
श्वास-श्वास में जीवित रहता, कुल का पुण्य-विधान।
पितर-दीप से दीप्त परंपरा, संस्कारों की धारा,
जिनसे पावन होता जीवन, जिनसे जग उजियारा।
तर्पण में केवल जल कहाँ है, हृदय समर्पित होता,
अंतर का अभिमान गलाकर, चित्त स्वयं निर्मल होता।
जलांजलि की बूँद-बूँद में, श्रद्धा-सागर बहता,
देह भले ही दूर हुई हो, संबंध अमर रहता।
स्मृति में केवल छवि न ठहरे, कर्म अमर हो जाए,
बीते जीवन का उजियारा, वर्तमान में आए।
स्मरण जगे तो अंतर्मन में, चेतन-दीप जलता,
दृश्य-अदृश्य के बीच मौन का, सेतु सहज ही खुलता।
आशीष बने तपती राहों में, शीतल छाया जैसी,
धैर्य जगे, सत्कर्म फले, अंतःज्योति हो ऐसी।
वरदहस्त-सा सूक्ष्म संरक्षण, मस्तक पर जब रहता,
वंश-बीज से चेतन-वृक्ष, अनंत गगन तक बढ़ता।
- सनातन मुकुंद
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