आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पितृपक्ष : वंदना

                
                                                         
                            पितृदेवों को नमन हमारा, श्रद्धा-सुमन चढ़ाते हैं,
                                                                 
                            
सूक्ष्म-स्मृति के दीप जलाकर, अंतर्मन जगमगाते हैं।

रक्त-धारा में कौन प्रवाहित, किसका चिर-संस्कार है?
श्वास-श्वास में कौन स्पंदित, किसका अमर उद्गार है?

तर्पण-जल की पावन धारा, मूल-चरण तक जाती है,
मौन अंजलि की सूक्ष्म तरंगें, पितृलोक तक जाती हैं।

वंश-वृक्ष के मूल-तत्त्व से, जीवन-पल्लव पाते हैं,
पितृ-कृपा के अमृत-कण से, संस्कार-पुष्प खिलाते हैं।

जो कुछ हममें सत्य-शेष है, उसमें आपका अंश रहे,
धर्म-ज्योति जब तक प्राणों में, पितृ-संस्कार अखंड रहे।

हे पितृगण! स्वीकार करो यह, श्रद्धा-दीप समर्पित है,
आपकी स्मृति से ही हमारी, चेतना प्रकाशित है।
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
49 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर