पितृदेवों को नमन हमारा, श्रद्धा-सुमन चढ़ाते हैं,
सूक्ष्म-स्मृति के दीप जलाकर, अंतर्मन जगमगाते हैं।
रक्त-धारा में कौन प्रवाहित, किसका चिर-संस्कार है?
श्वास-श्वास में कौन स्पंदित, किसका अमर उद्गार है?
तर्पण-जल की पावन धारा, मूल-चरण तक जाती है,
मौन अंजलि की सूक्ष्म तरंगें, पितृलोक तक जाती हैं।
वंश-वृक्ष के मूल-तत्त्व से, जीवन-पल्लव पाते हैं,
पितृ-कृपा के अमृत-कण से, संस्कार-पुष्प खिलाते हैं।
जो कुछ हममें सत्य-शेष है, उसमें आपका अंश रहे,
धर्म-ज्योति जब तक प्राणों में, पितृ-संस्कार अखंड रहे।
हे पितृगण! स्वीकार करो यह, श्रद्धा-दीप समर्पित है,
आपकी स्मृति से ही हमारी, चेतना प्रकाशित है।
- सनातन मुकुंद
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