मौन-मही के गर्भ से, नवांकुर उग आया है,
शुष्क शिला के वक्ष पर, हरित स्वप्न मुस्काया है।
तम की तह में बीज बना जो, निःशब्द सोया था,
प्रभा-स्पर्श पाकर वही, नव-पल्लव बन आया था।
टूटी शाखों पर फिर जैसे, कोमल किसलय मुस्काते हैं,
रीते ऋतु के नीरव वन में, नव-मधुमास जगाते हैं।
बूँद-बूँद में मेघ समाए, कण-कण में विस्तार छिपा,
सूक्ष्म बीज के मौन हृदय में, पूरा वन-संसार छिपा।
झरना केवल जल नहीं, गति का गूढ़ विधान कहता,
पत्ता केवल पत्ता कब है—प्राणों का स्पंदन बहता।
जब ‘मैं’ की कठोर छाल से, चेतन-बीज निकल आता है,
अंतर का निर्जन उपवन फिर, आत्म-प्रकाश से भर जाता है।
पल्लवन केवल शाखाओं का, हरित-वसन धरना नहीं,
भीतर सोए सत्य का ही, निज रूप में फिर खिलना है।
-सनातन मुकुंद
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