स्वर्ण-मृग के पीछे भागा, वन फिर भी सुनसान रहा,
मृगतृष्णा के मध्य खड़ा, घट भीतर वीरान रहा।
काँच-महल में दीप जला, छाया का विस्तार हुआ,
बुद्धि-जाल में बँधा पखेरू, नभ से भी लाचार हुआ।
दर्पण ने मुख देख लिया, चेहरा फिर भी अनजान रहा,
नदी स्वयं को खोजती रही, तट भी मूक विधान रहा।
शब्दों ने ब्रह्मांड नापा, मौन स्वयं अपार रहा,
बूँद स्वयं को माप न पाई, सागर उसका सार रहा।
‘मैं’ की गाँठ खुली तो जाना, बंधन ही आधार रहा,
जिसे खोजता रहा जगत् भर, वह भीतर साकार रहा।
दीप स्वयं को दग्ध कर गया, तम का अंत प्रकाश हुआ,
अर्पित होकर शून्य हुआ जो, वही पूर्ण आकाश हुआ।
नाव जली तो पार मिला, तट का भ्रम निष्प्राण हुआ,
स्वत्व-विसर्जन के क्षण में, मौन स्वयं उद्घोष हुआ।
दर्पण के उस पार खड़ा था, जो अब तक अनजान रहा—
स्वयं मिटा तो स्वयं मिला, शेष न कोई भेद रहा।
- सनातन मुकुंद
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