माता ममता-चाँदनी, जीवन का मधुमास।
पिता हिमालय-धैर्य से, गढ़ते शुभ विश्वास॥
मित्र बने मधु-पवन-सम, हरते मन की पीर।
बंधु वट-वृक्षों-से खड़े, देते छाया-नीर॥
गुरु प्रज्वलित ध्रुवदीप हैं, तम का करते क्षय।
अनुशासन गंगाजल बने, धो दे मन का भय॥
अनुभव पीपल-छाँव-सा, सीख सुवासित फूल।
प्रेरणा अरुणोदय बने, मिटे निराशा-शूल॥
सबके ऋण से गुंजित है, जीवन-वीणा-राग।
कृतज्ञ अन्तर नित्य गाए, वंदन-अनुराग॥
- सनातन मुकुंद
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