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कृतज्ञता : प्रतीकात्मक आभार गीतिका

                
                                                         
                            माता ममता-चाँदनी, जीवन का मधुमास।
                                                                 
                            
पिता हिमालय-धैर्य से, गढ़ते शुभ विश्वास॥

मित्र बने मधु-पवन-सम, हरते मन की पीर।
बंधु वट-वृक्षों-से खड़े, देते छाया-नीर॥

गुरु प्रज्वलित ध्रुवदीप हैं, तम का करते क्षय।
अनुशासन गंगाजल बने, धो दे मन का भय॥

अनुभव पीपल-छाँव-सा, सीख सुवासित फूल।
प्रेरणा अरुणोदय बने, मिटे निराशा-शूल॥

सबके ऋण से गुंजित है, जीवन-वीणा-राग।
कृतज्ञ अन्तर नित्य गाए, वंदन-अनुराग॥
- सनातन मुकुंद
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5 घंटे पहले

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