आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जीवन का संतुलन : शास्त्रीय–दार्शनिक मुक्तक

                
                                                         
                            सुख-दुःख संग आएँ, मन सम रखो सदा,
                                                                 
                            
धूप-छाँव सह जाओ, मत छोड़ो मर्यादा।
जीवन की डोरी को, दोनों ओर सँभालो,
समता के पथ पर ही, अपना पग बढ़ा लो।

धन आए तो विनय रहे, यश आए तो मान नहीं,
ज्ञान बढ़े तो अहं न बढ़े, मन में अभिमान नहीं।
भोग रहे पर योग रहे, कर्म रहे निष्काम,
संतुलित जीवन में मिले, सुख-शांति का धाम।

आशा रखो किन्तु कभी, मोह में मत बह जाना,
लक्ष्य रखो ऊँचा लेकिन, मूल न अपना खो जाना।
वर्तमान को साध लो, कल की चिंता छोड़,
संयम से जो जीवन जीए, वही बने सिरमौर।

मन हो निर्मल, बुद्धि प्रखर, वाणी मधुर बनी रहे,
कर्मों में हो धर्म सदा, अंतस में हरि ध्वनि रहे।
अति से बचकर मध्य चलो, यही जीवन का सार,
संतुलन जहाँ साधा गया, वहीं खिले संसार।
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर