सुख-दुःख संग आएँ, मन सम रखो सदा,
धूप-छाँव सह जाओ, मत छोड़ो मर्यादा।
जीवन की डोरी को, दोनों ओर सँभालो,
समता के पथ पर ही, अपना पग बढ़ा लो।
धन आए तो विनय रहे, यश आए तो मान नहीं,
ज्ञान बढ़े तो अहं न बढ़े, मन में अभिमान नहीं।
भोग रहे पर योग रहे, कर्म रहे निष्काम,
संतुलित जीवन में मिले, सुख-शांति का धाम।
आशा रखो किन्तु कभी, मोह में मत बह जाना,
लक्ष्य रखो ऊँचा लेकिन, मूल न अपना खो जाना।
वर्तमान को साध लो, कल की चिंता छोड़,
संयम से जो जीवन जीए, वही बने सिरमौर।
मन हो निर्मल, बुद्धि प्रखर, वाणी मधुर बनी रहे,
कर्मों में हो धर्म सदा, अंतस में हरि ध्वनि रहे।
अति से बचकर मध्य चलो, यही जीवन का सार,
संतुलन जहाँ साधा गया, वहीं खिले संसार।
- सनातन मुकुंद
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