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देर आए, दुरुस्त आए : दार्शनिक–आत्मबोधपरक गीतिका

                
                                                         
                            देर भले हो, राह मिली तो, जीवन फिर मुस्काया है,
                                                                 
                            
भटका पथ जब सत्य मिला, अंतर-दीप जलाया है।

सूखे वन में मेघ घिरे तो, अंकुर फिर लहराया है,
टूटी वीणा के तारों ने, नव-सुर फिर गाया है।

भूलों की जब धूल झड़ी तो, निर्मल दर्पण पाया है,
अंधी दौड़ रुकी तो मन ने, अपना सत्य जगाया है।

रात्रि भले ही दीर्घ रही हो, प्रभात स्वयं मुस्काया है,
डूबा सूरज लौट न पाया, नव-दिन फिर जगमगाया है।

बीता क्षण वापस न आया, वर्तमान सँवर आया है,
घाव पुराने दीप बनकर, तम में पथ दिखलाया है।

देर हुई तो क्या भय मन को, चेतन फिर जागा है,
गिरकर उठना हार नहीं है, जीवन का अनुराग है।

जो कल तक था दूर स्वयं से, आज स्वयं को पाया है,
देर भले हो—दुरुस्त हुआ तो, जीवन सफल बनाया है।
- सनातन मुकुंद
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3 घंटे पहले

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