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चंदन : क्षरण में सुगंध

                
                                                         
                            घर्षण में भी गंध जगे, तन क्षीण, चेतन सुवासित हो,
                                                                 
                            
विषधर-वेष्टित वक्ष रहे, फिर भी अंतस शीतल हो।

दाहानल में तपकर भी, निज शीतलता बरसाता हो,
परहित-यज्ञ की वेदी पर, निज अस्तित्व चढ़ाता हो।

क्षरण बने जब साधना, कण-कण चिर-उपकार बने,
मलय-सौरभ प्राण बहे, चेतन ब्रह्माकार बने।

निज तत्त्व लुटाकर जो, जग के अंतर-तम को हरता है,
चंदन-सा निष्काम हृदय, ब्रह्म-सुगंध से भरता है।
-सनातन मुकुंद
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2 hours ago

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