तम की चादर ओढ़ धरा, निःशब्द साधना साधे,
निशि के गहन गर्भ में, उषा-स्पंदन जागे।
तारों की झिलमिल पलकों पर, स्वप्न अनाम सँवरें,
सूनी शाखों की नस-नस में, हरित स्पंदन उभरें।
द्वार तले वह दीप अकेला, आँधी से बतियाए,
काँप रही लौ के अंतर में, अडिग उजास समाए।
श्याम शिला के गर्भ में, अरुण-कण अंगड़ाते हैं,
तम की कठोर पर्त चीरकर, प्रभा-बीज मुस्काते हैं।
माटी तले पड़ा बीज, अपना रूप भुलाता,
मौन क्षरण की साधना से, नवजीवन बन जाता।
पीड़ा जब वीणा बनती, मौन राग सुनाता,
अंतर-कपाट खुलते ही, सत्य स्वयं झिलमिलाता।
भोर गगन से उतर न आए, पहले चेतन ज्योति खिले,
अंतस का तम दूर हो जाए, सत्य-सुधा के द्वार खुले।
रात्रि जितनी गहन रहे, उतना प्रभात निखरे,
भोर से पहले तम का कण-कण, स्वर्णिम आभा बिखरे।
- सनातन मुकुंद
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