आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

भावों का दर्पण

                
                                                         
                            शब्द नहीं—ये मौन तपस्या, प्राणों का अभिनंदन,
                                                                 
                            
भावों के दर्पण में झिलमिल, चिर-अनहद का स्पंदन।

अक्षर-अक्षर दीप जले जब, तिमिर स्वयं झुक आया,
पीड़ा ने मुस्काकर अपने, अश्रु-कुसुम बरसाया।

स्वप्न नहीं—यह चेतन-सरिता, बहती अंतरधारा,
जिसमें डूबा, उसी हृदय ने पा लिया निज किनारा।

यहाँ व्यथा भी वंदन बनकर, मंगल-गीत सुनाती,
शुष्क शिला की नीरवता में, निर्झर-वीणा गाती।

एक वर्ष क्या—काल स्वयं भी, साधना में ढलता,
क्षण-क्षण अक्षर-ज्योति बन, युग-मानस में जलता।

भावों का यह दर्पण केवल, बाह्य रूप निहारे?
यह तो अंतर-ब्रह्मदीप का, शाश्वत सत्य उभारे।

युग-युग तक यह सृजन-ज्योति, चेतन-नभ आलोकित,
मानवता के मौन हृदय में, रहे चिरंतन स्पंदित।
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर