बिंदु-बिंदु में सिंधु पुकारे, लहर अनंत को जाए,
कण-कण में नभ समाया, मौन रहस्य खुल जाए।
मृगजल-रूपी स्वप्न पिघलते, सत्य-सुधा झरती जाए,
नेति-नेति के मौन पथों पर, आत्म-ज्योति मुस्काए।
बीज स्वयं में वृक्ष खोजता, मूल नभ तक जाए,
सीमित श्वास अनंत पुकारे, बंधन सारे गल जाएँ।
इच्छा जब निज स्रोत पहचाने, आकांक्षा मिट जाए,
‘मैं’ के गलते शून्य-कुंड में, पूर्ण स्वयं प्रकटाए।
- सनातन मुकुंद
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