यूं ज़िन्दगी को समझने से, तुम्हें क्या मिलेगा !
उस से खामखा उलझने से, तुम्हें क्या मिलेगा !
ख़ुशी से जी लो जितना भी लिखा है नसीब में,
यूं ही दिल में गुबार भरने से, तुम्हें क्या मिलेगा !
जो दिया है ख़ुदा ने बस सब्र कर उतने पे यार,
यूं हर चीज़ पर मर मिटने से, तुम्हें क्या मिलेगा !
दुनिया में वैसे भी क्या कमी है ग़मों की दोस्त,
अपने आप से ही यूं लड़ने से, तुम्हें क्या मिलेगा !
मिल जाये यूं ही सब तो ख़ुदा की क्या ज़रुरत,
सोचो उसके खिलाफ जाने से, तुम्हें क्या मिलेगा !
गर आम मीठे है तो जी भर के खा जाओ "मिश्र",
यूं ही बेकार में उन्हें गिनने से, तुम्हें क्या मिलेगा !
शांती स्वरूप मिश्र
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