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तुम्हें क्या मिलेगा

                
                                                         
                            यूं ज़िन्दगी को समझने से, तुम्हें क्या मिलेगा !
                                                                 
                            
उस से खामखा उलझने से, तुम्हें क्या मिलेगा !

ख़ुशी से जी लो जितना भी लिखा है नसीब में,
यूं ही दिल में गुबार भरने से, तुम्हें क्या मिलेगा !

जो दिया है ख़ुदा ने बस सब्र कर उतने पे यार,
यूं हर चीज़ पर मर मिटने से, तुम्हें क्या मिलेगा !

दुनिया में वैसे भी क्या कमी है ग़मों की दोस्त,
अपने आप से ही यूं लड़ने से, तुम्हें क्या मिलेगा !

मिल जाये यूं ही सब तो ख़ुदा की क्या ज़रुरत,
सोचो उसके खिलाफ जाने से, तुम्हें क्या मिलेगा !

गर आम मीठे है तो जी भर के खा जाओ "मिश्र",
यूं ही बेकार में उन्हें गिनने से, तुम्हें क्या मिलेगा !

शांती स्वरूप मिश्र


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6 वर्ष पहले

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