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यह तो इतिहास का हिसाब है

                
                                                         
                            “यह तो इतिहास का हिसाब है”
                                                                 
                            

साहब हैं तो भाई, हर चीज़ मुमकिन है,
दुख में भी उत्सव, और संकट में फन है।
देश को गंभीर होकर बचाने का संदेश दिया,
फिर खुद विदेशों का टिकट कन्फर्म किया।।

कहते हैं, “देश संकट में है, संभलना होगा!”
अगले ही पल मुझे विदेश निकलना होगा।
क्योंकि देश की समस्या मैं देख नहीं पाता,
और देख भी लूं तो खुलकर हँस नहीं पाता।।

देशवासी भी इतने निर्दयी कहाँ होते!
जो ‘प्रधान सेवक’को उदास देख सोते!
सेवक भी निकले सच्चे देशभक्त!
जनता के खुशियों की खातिर,
विदेश निकल पड़े फटाफट।।

वहाँ पहुँचते ही माहौल बदल जाता है।
चेहरे पर बचपन वाला आनंद मचल जाता है।
सिर्फ हँसते नहीं, पूरा “फन” करते हैं,
टाॅफी बाँटते, गले मिलते, रंग भरते हैं।।

देखकर लगता है कई बार भाई,
एक “बाल इन्द्र” अब उनमें समाई।
जो इंसान मस्ती करने निकला हो विदेश,
उससे सवाल पूछना क्या उचित, विशेष?

ये तो वैसी ही बात हुई यार,
हम गए हों ननिहाल, छुट्टी मनाने।
और मामा जी ने पकड़ लिया आँगन में।
“चल तेरह का पहाड़ा सुना आनन-फानन में!!”

दोस्तों, मामा जी को तो कुछ कह न पाते,
डर के मारे हम अपना, बस कान खुजाते।
लेकिन यहाँ मामला थोड़ा अलग हो गया,
विश्वगुरू ने पत्रकार को “मामू” बना दिया।।

अब फ्री प्रेस वाले भी क्या सोच रहे थे?
“सवाल पूछ लेंगे” और सुरक्षित रहेंगे?
अरे! सामने हो नन-बायोलाॅजिकल,
तो सवाल भी पूछो ज़रा लाॅजिकल!!

‘सर जी’ ने ऐसा मास्टर स्ट्रोक चलाया,
पत्रकार का अकाउंट ही गायब कराया।
इंस्टाग्राम शांत, फेसबुक मौन, यू-ट्यूब
चला गया यूं जैसे “एयरप्लेन मोड” !!

ये तो सज़ा मिलनी ही थी भाई,
फ्री प्रेस को भी समझ आनी चाहिए थी सच्चाई।
फ्री प्रेस भले ही कहलाओगे,
लेकिन सवाल पूछोगे तो “आउट” हो जाओगे।।

दुनिया की सबसे “फ्री प्रेस” पर भी,
अपनी छाप छोड़ आया यह फकीर भी।
कहीं टाॅफी, कहीं ताली, कहीं मुस्कान छोड़ आए।
गोदी मिडिया के लिए “डिबेट” का तूफान फोड़ आए।।

मीडिया बोली, “वाह! क्या विदेश नीति है!”
भक्त बोले, “यही असली कूटनीति है!”
जनता बोली, “रोज़गार का क्या हुआ?”
मुर्खों! देखो, “किसे गले लगाया हुआ!!”

देश में प्रश्न अभी भी खड़े हुए हैं।
लेकिन कैमरे विदेशों में पड़े हुए हैं।
यहाँ महँगाई, बेरोज़गारी, संघर्ष का मौसम है।
वहाँ सेल्फी, स्माइल और तालियों का आलम है।।

भाई यह लोकतंत्र भी बड़ा निराला है।
यहाँ सवाल पूछना भी जोखिम वाला है।
लेकिन समय सब देख रहा है चुपचाप।
इतिहास रखता है हर बात का हिसाब।।
-शम्भु प्रसाद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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