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हिंदी शीर्षक :- हारे मन की दशा

                
                                                         
                            हारे मन की दशा को खुद से बेहतर कौन जनता है ??
                                                                 
                            
मन में उठती पीड़ा को खुद से बेहतर कौन समझता है ??
मन की दुर्बलता बार बार ऐसे हॉबी हो जाती है l
एक और प्रयास करना भी चाहूं तो करने कहां देती है ?
हर बार मेरी कोशिशों को नाकाम करने की साजिश करती ।

मन का बोझ इतना बढ़ जाता कि हम मान लेते हैं कि ,
दुबारा मुझसे कोशिश न होगी !!
ये हारा मन हारकर इतना कठोर हो जाता है ।
दर्द, असफलता और उदासी इसमें ,
बस यही सब रह जाता है ।

पर उस हार के बोझ तले, दबकर क्या रह जाना है ?
या जीत कर मन और हालातों को ,
दोनों पर विजय पाना है ?

खुद से अब आपको दृढ़ता से कहना होगा ही,
असफलता का डर त्याग कर एक और कोशिश करना होगा ही,
हारे मन को जीत का दर्पण दिखाना होगा ही,
उस हार के गहरे सदमे से तो बाहर आना होगा ही ।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
10 महीने पहले

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