आँखों में एक अन-सुलझा सवाल लिए,
दर-दर फिरा किए दिल में मलाल लिए।
तड़पा किए जल बिन मछली की तरह,
दौर-ए-हिज्र ख़्वाहिश-ए-विसाल लिए।
रोज़ लगाया किए फेरे तेरी रह-गुज़र के,
आँखों में तेरा ही अक्स-ए-जमाल लिए।
जागा किए रात भर करवटें बदलते हुए,
अपने ज़ेहन में मुख़्तलिफ़ ख़याल लिए।
बहुत इतराए हुस्न वालों की महफ़िल में,
लरजते हाथों में जाम-ए-सिफ़ाल लिए।
--- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
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