आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

स्याही

INK
                
                                                         
                            मोमिन का दर्द, या ग़ालिब की तन्हाई लिखूँ,
                                                                 
                            
टॉलस्टॉय का संघर्ष या टैगोर का सम्मान लिखूँ।।

क़ुरआन की आयत, या गीता का सार लिखूँ,
की बदलती रिवायत, या फनाह होती तहज़ीब लिखूँ।।

चांद की चांदनी, या फिर सूरज की आग लिखूं, 
कुछ गुलशन गुलदस्तों पर या सुनसान रास्तों पर लिखूं।।

शाहजहां के ताज पर या बेताज फकीरों पर लिखूं,
रेड-लाइट शहरों पर, या अंधेरे गांव की तस्वीर लिखूं।।

बच्चा चोरी पर, या बाल-मजदूरों पर लिखूं,
खुली किताबों पर, या बंद पड़े स्कूलों पर लिखूं।।

मुम्बई का आतंक, या बाबरी पर हूई सियासत लिखूं,
दादरी का दर्द, या 16 बरस बच्चे का लहू लिखूं।।

बंटी शरहदों पर, या मारे गए सैनिकों पर लिखूं,
जानवरों पर हूई सियासत, या धर्म पर बंटे इंसानों पर लिखूँ।।

मैं लिखूं भी तो स्याही कौन सी लूँ
रंग हरा या भगवा लूँ।।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
 
8 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर