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प्रेम

                
                                                         
                            कुछ वजह है बेवजह मुस्कुराने की
                                                                 
                            
याद आती नहीं यूं तुम्हें दीवाने की

ये सुना है बहुत फ़साना साज़ हैं वो
नाम लेने में तोउजरत नहीं बहाने की

देखना उनका मेरी ओर अदा से जाना
जाते जातीं नहीं आदात ये जताने की

देखना शीशे में सौ बार तस्दीक लिये
हुस्न की उफ!ये अदा आज़माने की

शाह चाहत के ये अन्दाज़ निराले ठहरे
क्या ज़ुरूरत भला इसमें दिल लगाने की

शहाब उद्दीन शाह क़न्नौजी

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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