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“शब-ओ-सहर”

                
                                                         
                            मेरी तुमसे क़ुर्बत ऐसी रही,
                                                                 
                            
कि मेरी मोहब्बत ग़म-ए-हिज्र बन गई।

मेरे ज़र्फ़ और मेरे वजूद को
तुम ने रेज़ा-रेज़ा कर दिया।
मेरे मुक़द्दर में,अब हिज्र ही लिखा है ।

मेरा आग़ाज़ ही
अज़ाब बन गया।

तुमसे अब कोई गिला नहीं,
तुमने कोई सिला दिया नहीं।

मेरे तसव्वुर में
तुम शब-ओ-सहर रहे,
और मेरी तहरीर में
बस तुम्हारा ही ज़िक्र रहा।

 
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एक घंटा पहले

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