न कोई जाम हो तुम न कोई प्याला हो तुम
महफिल की रौनक हुस्न का उजाला हो तुम
अरे जिसे देखकर ये सौरव लिखता है ग़ज़ल
वो मधुशाला नहीं कुसुम बाला हो तुम
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