एक समय था जब चीजें कसकर पकड़ने की आदत थी
फिर चाहे खिलौना हो, मां का आंचल हो या दूध का गिलास
डर लगता था कि छूट गया तो क्या होगा?
लेकिन वक्त कहां रुकता है फिसल ही गया हाथ से
और वक्त के साथ फिसलने लगे रिश्ते भी
हाथों में रह गई बस उन रिश्तों की महक
लेकिन अब सीख लिया है चीजों को हल्के हाथ से पकड़ना
रिश्तों को आजाद रखना
भूलते जाना, भूलाते जाना
जाती हुई चीजों को जाने देना
ऐ जिंदगी अब तू भी आना
तो उम्मीद का सेहरा बांध कर आना
तुझे गुजरे वक्त की यादों से आजाद रखने का वादा है मेरा।
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