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ऐ जिंदगी उम्मीद का सेहरा बांध कर आना...

AI ZINDAGI UMEED KA SAHRA BANDH KAR AANA
                
                                                         
                            एक समय था जब चीजें कसकर पकड़ने की आदत थी
                                                                 
                            
फिर चाहे खिलौना हो, मां का आंचल हो या दूध का गिलास
डर लगता था कि छूट गया तो क्या होगा?

लेकिन वक्त कहां रुकता है फिसल ही गया हाथ से
और वक्त के साथ फिसलने लगे रिश्ते भी
हाथों में रह गई बस उन रिश्तों की महक

लेकिन अब सीख लिया है चीजों को हल्के हाथ से पकड़ना
रिश्तों को आजाद रखना
भूलते जाना, भूलाते जाना

जाती हुई चीजों को जाने देना
ऐ जिंदगी अब तू भी आना
तो उम्मीद का सेहरा बांध कर आना

तुझे गुजरे वक्त की यादों से आजाद रखने का वादा है मेरा।

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8 वर्ष पहले

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