राहों पर अंधेरो से लगता है डर
मानो साँसे थम सी गई हो बीच डगर
यह अंधेरा है स्वार्थ,अहि मन धोखो का
बेचैन सी निगाहे देखती हरकत लोगो का
लोभी मन पैसो का,पैसा ही मानो धड़कन
अपनो में ही लड़ाई, वे कभी संग थे बचपन
बट गई भूमि,बट गए द्वार और बटा परिवार
सहसा खत्म हो गई खुशिया,खत्म हो गया प्यार
-सौरभ दीक्षित
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