जगो! जगो! हे भाग्य विधाता
हे भारत के मतदाता ।
संकट-कंटक बडा विकट है
गिरोह गिद्ध का खड़ा निकट है
राजनीति का सियार समूह भी
नोंच-नोंच कर लाशें खाता
जगो! जगो! हे भाग्य विधाता
हे भारत के मतदाता ।
परमारथ का पहन मुखौटा
प्रतिनिधि बनकर झूठा-मूठा
राजधर्म की यज्ञ वेदी पर
अपराधों का रक्त चढाता
जगो! जगो! हे भाग्य विधाता
हे भारत के मतदाता ।
बगुले जैसा स्वांग रचाकर
परजीवी सा घातक बनकर
सहानुभूति के चक्र जाल में
मछुआरे की तरह फंसाता
जगो! जगो! हे भाग्य विधाता
हे भारत के मतदाता ।
करदाता के रथ पर चलता
पथ में आते उन्हे कुचलता
अर्थी को फिर कांधा देकर
मरघट से भी कफन चुराता
जगो! जगो! हे भाग्य विधाता
हे भारत के मतदाता ।
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X