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आखिरी रिफा़

                
                                                         
                            रूठी हुई तकदीर को मनाने का जिम्मा मेरा कब से हुआ?
                                                                 
                            
उम्मीद ही है जो हर ख्वाब तोड़कर उलझाए जा रही है मुझको।
हर शिकायत तेरी खत्म करने की जुगत में लगा हूँ,
मर्ग पर मेरी, यह जो फ़िक्र-ए-हयात है ना, यही रिफ़ा पहनाए जा रही है मुझको।
-सत्यनिधि द्विवेदी अंशिल
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2 घंटे पहले

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