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भूलने के लिए सौ जनम तो चाहिए.....

                
                                                         
                            सुरमई शाम कब की विदा हो गई
                                                                 
                            
न भूल पाये चंपई गंध को हम सारे
भूलने के लिये सौ जनम तो चाहिए
नैन संबंध जुड़े क्षण भर को हमारे।

प्रभात किरणों की गुलाबी-गुलाबी छुअन
निद्रा के भ्रमरंगों को स्वप्न दे गई
निशा को देकर शबनमी से रतजगे
खिलखिला कर मोहित मन को कर गई।

याद करते रहे थरथराते अधर
सौगंध हृदय की आरक्त हो गये हमारे।

उठती प्रभात से नीली साँझ तक
तपिश सहते रहे प्राण सलिलज से
बदन जलाती रही धूमिल बदलियाँ
अंग-अंग सुलगते रहे उजयाली रैन से।

अनछुई चाहतों को न छोड़ पाए हम
खंड-खंड कर गई आसक्त आबंध हमारे।

सरगम गाती मुस्कुराती हुई परी
देखते – देखते अनजान हो गई
मृदुल पलकों में जलते चराग सो गये
झिलमिलाती हुई ज्योति खो गई।

लहरों सी चली अश्रुओं की मचलती तरंगिणी
बड़े योग से बँधे मन के गुबार तोड़े तटबंध हमारे।

-----सतीश शेखर श्रीवास्तव “परिमल”
      नवजीवन विहार से.नं. ४, विन्ध्यनगर
      सिंगरौली (मध्यप्रदेश)
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3 वर्ष पहले

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