पीताभ प्रभा में लिपटी यह लावण्य-लता अलौकिक-सी,
मानो भू पर उतर पड़ी हो सुरसुन्दरी मनमोहक-सी।
हरित-वसन की श्यामल छाया, नव-वसन्त का मधुर आगमन,
मंद-मंद मुस्कान बिखेरे, भर दे उर में जो नव स्पंदन।
अलक-जाल की सलिल-धारा, निशा-वधू का गहन अँधेरा,
नयनों की अवनी पर उतरा स्वप्निल शशि का कोमल डेरा।
भाल-बिन्दु की सूक्ष्म रेखा, शुभता का अभिनव आलोक,
मानो सरस्वती ने स्वयं रच दिया सौन्दर्य का श्लोक।
कंगनों की कल-कल ध्वनि में ऋतु-रागों का मधुर विधान,
कर-कमलों में थिरक रही हो सृष्टि-सृजन की प्रथम तान।
घेर उठाती पीत चुनरिया, जैसे उषा गगन को छू ले,
या स्वर्णिम किरणें धरती पर इन्द्रधनुष के स्वर को बुन लें।
लज्जा जिसकी अनुपम आभा, शील जिसका दिव्य श्रृंगार,
सौम्यता का सजीव प्रतीक, कोमलता का पावन हार।
रूप नहीं केवल आकर्षण—यह संस्कृति का शुद्ध प्रकाश,
शील-सौम्यता से आलोकित मर्यादित मंगलमय उल्लास।
हे अन्तःकरण के मौन सौन्दर्य! यह तन की क्षणिक छटा नहीं,
यह निर्मल मानस की वह घटा, जिसमें प्रणय कुछ घटा नहीं।
इस छवि में प्रेम, विनय, विश्वास का झरता मधुर प्रसार—
मानो "पंत" ने स्वयं गूँथा हो अजर-अमर सौन्दर्य का हार।
~सतीश पंत
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