रात मुझे एक सपना आया,
सपने में बस तुमको पाया।
झुके हुए दृगों के दर पे,
मैंने मधुशाला को पाया।
ढूंढ रहे थे अधीर अम्बक,
मन में बहता प्रेम अनुराग।
अलको का अंधकार चीर रहे,
श्वेत कपोलों के चंचल चिराग।
स्मित चांदनी लुटा रही थी,
अधरों की अविरल मुस्कान।
कोमल कंठ से गूंज रहा था,
तेरे दिल में मेरा गान।।
धड़कन की हर ताल पे जैसे,
सांसों का संगीत सजा था।
लगा समूची कायनात में,
प्रेम का कोई गान बजा था।।
खुली नीन्द,तेरा रूप निहारा,
पलकों में बस तुमको पाया।
बीत गई यामिनी बातों में
स्वप्न तेरा भोर तक आया।।
रात मुझे एक सपना आया,
सपने में बस तुमको पाया।
-संतराम शर्मा'हिन्दी'
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