मैं नयनों की नींद उनीन्दी
तुम बन्द पलकों का स्वप्न प्रिय।
मैं हृदय की खुलती खिङकी,
तुम रिश्तों का स्पन्दन प्रिय।
मैं भोर का रक्तिम सौंदर्य,
तुम चांदनी रात की चमक प्रिय।
मैं उङती घनघोर बादली,
तुम दामिनी की दमक प्रिय।
मैं बहती हुई निर्मल धारा,
तुम दूर क्षितिज का छोर प्रिय।
मैं बिखरा सौरभ धरती का,
तुम सागर की लोर प्रिय।
मैं विरही मन का प्रेम पथिक।
तुम उत्सुक मन का ठोर प्रिय।
मैं खामोशी का सूनापन,
तुम मन को भाता शोर प्रिय।
इस भीड़-भाड़ की दुनिया में,
तुझे पाया है हर ओर प्रिय।
मेरा मन तेरे मन का मंदिर है
यहां आता नहीं कोई और प्रिय।
-संतराम शर्मा'हिन्दी'
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