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कोई शीतल सलिल हो

                
                                                         
                            तुम्हें मनाना एक
                                                                 
                            
ख्वाब है,
तुम्हारा रूठना
एक किताब है।

पढूं मैं, वो
दिलकश किस्सा,
जिसमें तेरी
अदाएं बेहिसाब हैं।

पन्नों को पलटूँ तो
यादें महक उठें,
हर एक पन्ने पर
तेरा ही ख्वाब है।

तेरी खामोशी भी
कुछ-कुछ कहती है,
जैसे बिना बोले
दिया कोई जवाब है।

रूठना तेरा जैसे,
कोई शीतल सलिल हो,
मनाना मेरा जैसे
कोई प्यास है।

तू दूर सही पर,
मेरे दिल के पास है।
बस यही मेरी,
रूह का एहसास है।
-संतराम शर्मा'हिन्दी'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
45 मिनट पहले

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