वो हर एक शाम चौखट पर अभी दीपक जलाती हैं
वो बूढ़ी आंख से हर दिन दरो-दीवार रंगती है
चला आये परिंदा उड़ते उड़ते थक गया होगा
लिए पानी का लोटा देहरी पर ही लेट जाती है
वो हर एक शाम चौखट पर अभी दीपक जलाती है
बड़ी हसरत से अब भी राह पर होती नजर उसकी
पुरानी याद की गठरी ही है अब जिसकी जमा पूंजी
उन्हें ही याद कर चेहरे पर अब मुस्कान लाती है
वो हर एक शाम चौखट पर अभी दीपक जलाती है.
कई रातें जो अपनी नींद की न्योछावर करती है
ये वो आँखें है तेरी उम्र भर से राह तकती हैं
वो मंदिर में तेरी खातिर अभी माथा टिकाती है
वो हर एक शाम चौखट पर अभी दीपक जलाती है
कभी कोई खबर दे दे भला चंगा कहीं है तू
तेरी खातिर दुआओं से वो उसकी झोली भर देती
तेरी लम्बी उमर को अब भी वो ताबीज लाती है
वो हर एक शाम चौखट पर अभी दीपक जलाती है
सरोज यादव सरु
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