लगा रहा अक्सर पूछा जाता है क्षितिज है कहाँ
जमीनों आशमां का प्रेम बस कपोल कल्पित
वजन रखते हैं समर्थन में वैज्ञानिक तथ्यों का
देते हैं बहुत सारे उदाहरण दूरी का
कौन लगा रहा है किसका चक्कर
क्या क्या भरा है किस ग्रह के अंदर
मगर फिर भी कल्पना में क्या बुराई है
आपकी अपनी हमारी अपनी रुबाई है
होंगे आपके ग्रह रूखे सूखे गैस या चट्टान के
जाइये कम से कम हम ऐसा नही मानते
मिल रहे है मेरे लिए जमीनों आशमां गले
मेरे पहाड़ दिखाते हैं ये नजारे आप न मानो भले
धानी चुनर पहने सकुचाई सी मेरी धरती
आसमान से किस रोज नहीं मिलती
देखा है मैंने दोनों को हर रोज घंटों बतियाते
कभी गगन को खूब जोर से हंसते और धरती को सकुचाते
कभी एक दूसरे से दोनों को जी भर झगड़ते
सहमी सी धरती पर गगन को गरजते
फिर पछतावे के आंसू गगन को बहाते
धरती को आंसू से धोते सुखाते
जीवन के हर रंग देखे हैं इनमें
अपनी कहानी सी सोचूं मैं मन में
नही बाध्यता है सही आप होंगे
मगर उसमे इतने कहाँ रंग होंगे
आएगी उससे क्या मुस्कान कोई
कहो कल्पना पर चले जोर कोई
वो देखो जमीं आसमां मिल रहे हैं
मेरी बात पर दोनों अब हंस रहे हैं।
-सरोज यादव "सरु"
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