उस नाव के लिए हवाएं क्या
जिसने साहिल न सोची हो
उस राही को राहों से क्या
जिसने मंजिल न सोची हो
मझधार उसी के लिए बनी
जो सिर्फ निराशा ही देखे
कब पर्वत उसने लांघा है
रस्ते की फिसलन जो देखे
जीवन को बोझ समझता है
खुद पर जिसको विश्वास नही
ईश्वर भी उस पर बस रोता है
जिसमें जीवित कोई आस नही
कोई अच्छा सा सपना पालो
फिर प्यार जगाओ सपने पर
दुनिया ये भले उपहास करे
तुम करो भरोसा अपने पर
तुम दिशा हवाओं के मोड़ो
विपरीत अगर वो बहती हैं
उस बात का कोई मोल नही
तुम हारोगे जो कहती हैं
विश्वास का दीपक लेकर तूँ
चल दे मंजिल की राहों पर
तुझसे कुछ भी अब दूर नही
बस कर तूँ भरोसा बाहों पर
कल का सूरज बस तेरा है
जो अंधियारा था बीत गया
तेरे दुख के उस सागर का
खारा पानी सब रीत गया
अब तूँ मशाल बन राहों का
गुमराहों को अब राह दिखा
जब हवा नही सहयोग करे
चलते कैसे हैं उन्हें सीखा
"""सरु"""
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