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तुम्हारे स्नेह के कोमल सुनहरे धागे से

                
                                                         
                            तुम्हारे स्नेह के कोमल सुनहरे धागे से
                                                                 
                            
बंध गया है जो बंधन वो सबसे प्यारा है

मैंने एक ख्वाब की दुनिया नई बनाई है
इस आसमान का तू चाँद और सितारा है

जहाँ से तुझको छिपाकर के रखा है दिल मे
कि धड़कनों को धड़कने का तू सहारा है

हजार बंदिशें और उलझने सम्भाले हुए
मैं चल सकूंगी मिला साथ तेरा प्यारा है

कभी भी हाथ मेरा छोड़कर न चल देना
मेरे सनम तू मुझे दो जहाँ से प्यारा है

न जाने कैसी खुशी है मिली मुझे तुमसे
मैं हूँ नदी और मुझे तू लगे किनारा है

तेरी खामोशियों से मैं बहुत ही डरती हूँ
तू मेरी सांस की डोरी का एक किनारा है

तूँ मुहब्बत है मेरी मैं तेरी परछाई हूँ
न जाना तुम वहाँ होता जहाँ अंधेरा है

बड़ी नादानियाँ करती हूँ मैं मुहब्बत में
मेरी गलती को भी सब तुम्हे भुलाना है

तुम्हारे स्नेह के कोमल सुनहरे धागे से
बंध गया है जो बंधन वो सबसे प्यारा है

सरोज यादव सरु

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले

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