क्यों जहर घोलते हो तुम जीने की राह में
गर हम नही रहे तो कल तुम भी न रहोगे
ये सारी तिकड़में भी नही काम आएंगी
जीना जरूर चाहोगे पर जी न सकोगे
इतना हवस भला क्यों चांदी की है तुम्हें
बस इसके सहारे भी तो जी न सकोगे
दुनिया मे दौलतों के कभी ढेर लगे थे
उस दौर की सूरत भी न पहचान सकोगे
दिल मे दया भाव का रौशन चिराग कर
इसके बिना तुम दूर ज्यादा जा न सकोगे
होता है बहुत देर तक चर्चा भलाई का
नफरत से नाम जिंदा ज्यादा रख न सकोगे
धरती ये राम कृष्ण की गौतम के प्रेम की
इनको भुला के सबको क्या बदनाम करोगे
अब लौट चलो प्रेम की दुनिया बुला रही
तुम दर्द के बाजार में अब कितना रुकोगे
""सरु""
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