आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तुम दर्द के बाजार में अब कितना रुकोगे

Tum Dard Ke Bazar Me Ab Kitna Rukoge
                
                                                         
                            क्यों जहर घोलते हो तुम जीने की राह में
                                                                 
                            
गर हम नही रहे तो कल तुम भी न रहोगे

ये सारी तिकड़में भी नही काम आएंगी
जीना जरूर चाहोगे पर जी न सकोगे

इतना हवस भला क्यों चांदी की है तुम्हें
बस इसके सहारे भी तो जी न सकोगे

दुनिया मे दौलतों के कभी ढेर लगे थे
उस दौर की सूरत भी न पहचान सकोगे

दिल मे दया भाव का रौशन चिराग कर
इसके बिना तुम दूर ज्यादा जा न सकोगे

होता है बहुत देर तक चर्चा भलाई का
नफरत से नाम जिंदा ज्यादा रख न सकोगे

धरती ये राम कृष्ण की गौतम के प्रेम की
इनको भुला के सबको क्या बदनाम करोगे

अब लौट चलो प्रेम की दुनिया बुला रही
तुम दर्द के बाजार में अब कितना रुकोगे

""सरु""

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
 
8 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर