जहाँ से दूर भी जाकर भला मिलेगा क्या
किसी ने कुछ भी है अच्छा वहां कहा ही नही
तलाश करने को खुशियां सफर करें कितना
अगर न दृष्टि हो तो वो कहीं मिले भी नही
मैं देखता हूँ तेरे पास भी कुछ है तो सही
जरा तूँ गौर कर ये तेरी खुशियां तो नहीं.
तू इतना क्यों भला कमजोर समझता खुद को
असीम है तू और क्षमता भी तेरी कम तो नही.
अभी से क्यों भला हतास हुआ जाता है
हजार राह है मंजिल की भी कमी तो नही
जिसे भी चाहे तूँ हासिल जरूर कर लेगा
जो दायरे से हो बाहर वो शै बनी ही नही
तेरे ही हाथ में दीपक की रौशनी भी छिपी
अंधेरा दूर न हो इतनी भी वो घनी तो नही
चमक उठेगा तूँ हजार दीप जैसे जलें
तूँ चाँद ही है कमी तुझमे रौशनी की नही
""सरु""
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