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स्नेह के बंधन निराले बिन छुए ही बंध गए

                
                                                         
                            स्नेह के बंधन निराले बिन छुए ही बंध गए,
                                                                 
                            
है तुम्हें विश्वास बंधन खोल कर दिखलाओ तो

हम अनाड़ी ही सही जो बिक गये बिन मोल ही
पर मेरे मन के लिए तो तुम रहे अनमोल ही

प्रेम का सौदा ये सच्चा तोड़ कर दिखलाओ तो
है तुम्हें विश्वास बंधन खोल कर दिखलाओ तो

ये निराला प्रेम बंधन तोड़ पाया कब कोई
प्रेम के मंजिल की राहें छोड़ पाया कब कोई

प्रीत की ये राह प्रियतम छोड़कर दिखलाओ तो
है तुम्हें विश्वास बंधन खोल कर दिखलाओ तो

क्या जरूरी है कि तुमको मैं पुकारूँ उम्र भर
है भरोसा जो मुझे तो वो सिर्फ अपने प्रेम पर

प्रीत की ये डोर कच्ची तोड़ कर दिखलाओ तो
है तुम्हें विश्वास बंधन खोल कर दिखलाओ तो

मैं नही रोकूंगी गर जाते हो दूजी राह तुम
कोई शिक़वा भी नही सुनते नही जो आह तुम

तोड़कर ये प्रेम मंदिर तुम मुझे ठुकराओ तो
है तुम्हें विश्वास बंधन खोल कर दिखलाओ तो

स्नेह के बंधन निराले बिन छुए ही बंध गए,
है तुम्हें विश्वास बंधन खोल कर दिखलाओ तो

सरोज यादव  सरु

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले

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