आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सफर जरूर ये सदियों से चल रहा फिर भी

Safar Jarur Ye Sadiyon Se Chal Raha Fir Bhi
                
                                                         
                            सफर जरूर ये सदियों से चल रहा फिर भी
                                                                 
                            
अभी तो दूर तक बस कारवां ही दिखता है

जले जरूर दिये राह में दो चार मगर
अभी अंधेरा है कम ही मशाल दिखता है

बहुत जरूरी है चलना भी बेहतरी के लिए
यहाँ अंधेरा है और सूरज भी दूर दिखता है

बड़े गजब हो तुम अपनो को क्यों गिराते हो
वो तेरा दोस्त है जो लहूलुहान दिखता है

ये सिर्फ उसकी लड़ाई नही समझ जाओ
तुम्हारा कल भी इसी राह से गुजरता है

अगर हैं हाथ हुनर पैदा कर मेरे साथी
बड़ा बेकार सा वो क्यों तुझे समझता है

हजार बंदिशे झेली हैं बस तेरी खातिर
और एक तूँ है जो घर से नही निकलता है

चलो कुबूल करो अब खुल के सांस का तोहफा
यहीं से कारवां फिर सीधी राह चलता है

अभी है दूर जो मंजिल तो दूर होने दे
कदम बढ़े तो मंजिल भी चलके आता है

""सरु""

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
 
 
8 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर