सफर जरूर ये सदियों से चल रहा फिर भी
अभी तो दूर तक बस कारवां ही दिखता है
जले जरूर दिये राह में दो चार मगर
अभी अंधेरा है कम ही मशाल दिखता है
बहुत जरूरी है चलना भी बेहतरी के लिए
यहाँ अंधेरा है और सूरज भी दूर दिखता है
बड़े गजब हो तुम अपनो को क्यों गिराते हो
वो तेरा दोस्त है जो लहूलुहान दिखता है
ये सिर्फ उसकी लड़ाई नही समझ जाओ
तुम्हारा कल भी इसी राह से गुजरता है
अगर हैं हाथ हुनर पैदा कर मेरे साथी
बड़ा बेकार सा वो क्यों तुझे समझता है
हजार बंदिशे झेली हैं बस तेरी खातिर
और एक तूँ है जो घर से नही निकलता है
चलो कुबूल करो अब खुल के सांस का तोहफा
यहीं से कारवां फिर सीधी राह चलता है
अभी है दूर जो मंजिल तो दूर होने दे
कदम बढ़े तो मंजिल भी चलके आता है
""सरु""
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