कितने हिस्से होते मन के
हर एक सहेजना होता है
खुशियों की उम्मीद करो
पर आंसू लेना होता है
कोई फर्क नही होता इससे
कोई बात पे कायम है कि नही
अपने हिस्से की बातों का
बस अपने किये हर वादे का
मन जिम्मेदारी लेता है
सबका मन अपने जैसा है
सबकी अपनी अभिलाषा है
कोई आशा से लबरेज यहाँ
कहीं बसती घोर निराशा है
कोई मन की बात पढ़े हरदम
कोई और के मन को ठोकर दे
कोई मन के हाथों मिट जाए
कोई मन का ही व्यापार करे
कोई मन को ईश्वर समझ रहा
और मन से सपथ उठाता है
कोई मन की अनदेखी करके
अपनो की हंसी उड़ाता है
अपना भी मन है पास मेरे
इसकी भी दुनिया अजब ही है
कोई कितना भी बेबस कर दे
कितने पलकों में आंसू दे
फिर भी मन भोला है अपना
अपनी पहचान बचाता है
आंसू भी सहेज के मन मेरा
हर हाल में बस मुस्काता है.....
सरोज यादव सरु
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